Mahant Shree Ganeshnath Ji Mahraj

आपका जन्म गुजरात राज्य के धानेरा तहसील के आकोली गांव में सन् 1964 में पिताश्री मेघाजी व माताश्री नवुबाई मेघवाल समाज के पराडिया गोत्र मे हुआ। आपका बचपन में नामकरण सुरताराम हुआ। चार बहिने और दो भाईयों के पांचवें नम्बर की संतान बालक सुरताराम का होना, लाड प्यार से पलकर बड़े हुए। पिताजी गांव में ही खेती बाड़ी करते थे। एक गरीब परिवार के होने के कारण दूसरे भाई बहिन मजदूरी करते थे। सात वर्ष की अवस्था में स्कूल में दाखिला करवाया। पढ़ाई में अव्वल रहना कुशाग्र बुद्धि के धनी खेलकूद मे भाग लेना अन्य गतिविधियों में रहते हुए गांव में पांचवीं कक्षा उत्तीर्ण की व पास के ही गांव झात में सातवीं कक्षा पास की।

बचपन से ही धार्मिक पुस्तके पढते साधु संतो की वाणी भजन कीर्तन सुनने को मन लालायित रहता था। घर में लाड प्यार से पलने वाले बालक की धार्मिक भावना देखकर पिताजी ने पास के ही गांव भीलडा तहसील धानेरा में सगाई कर दी। आपने झात गांव में सातवीं कक्षा अव्वल नम्बरों से उत्तीर्ण करने के पश्चात पालनपुर से आठवीं कक्षा में दाखिला लिया व दसवीं में विज्ञान विषय लिया। यौवन की दहलिज पर पैर रखने के पूर्व ही पिताजी ने शादी का प्रस्ताव रखा, परन्तु आपने तो आजीवन ब्रह्मचर्य रहने का निश्चय कर दिया था तो पिताजी को शादी के लिए मना कर दिया एवं अपनी होने वाली पत्नी को चुनरी ओढ़ाकर धर्म की बहन बना दिया।

ग्यारहवीं कक्षा में पढने हेतु जाते वक्त एक साधु के दर्शन हुए जिन्होंने भक्ति का मार्ग बताया था। मन भक्ति में लगने की वजह से ग्यारहवीं कक्षा की पढाई करीब छह माह तक ही कर पाए थे कि इसी वक्त एक अद्भुत चमत्कार ने मन को मोड़ दिया एवं पढाई करते करते पढाई को छोड़कर भक्ति का रास्ता पकड़ लिया। पढाई छोड़कर गांव में ही कुटिया बनाई और कुटियां में बैठकर दृढ़ निश्चिय के साथ भक्ति करने लगे और जब तक भगवान के साक्षात दर्शन नहीं होंगें अन्न नहीं खाउंगा। छह माह तक भगवान के नाम में लगे रहे परन्तु लोगों के आवागमन की वजह से तपस्या में व्यवधान होने के कारण आपने गांव आकोली से पांच किलोमींटर व गोगुवाड़ा से एक किलोमीटर दूर छोटी पहाड़ी पर कुकड़ी नामक स्थान पर एकांत में आ गयें। पहाड़ी पर निर्जन स्थान पर आकर धूणी बनाई व तपस्या में लीन हो गये। बिना अन्न ग्रहण किये मौन व्रत रखकर लगभग दो वर्ष तक एक ही जगह छोटी पहाड़ी पर तपस्या की।

आपने कुकड़ी स्थान की कुटिया छोड़कर 20 किलोमीटर दूर बड़ा पर्वत झासोर पहाड़ में चले गये जहां पर पांच दिन तक निर्जन स्थान पर गुफा में बैठकर बिना अन्न जल ग्रहण किये तप में लीन हो गये। झासोर का घना पहाड़ हरे भरे पेड़ कंटीली झाड़ियां जंगली जानवर तो उस पहाड़ में बहुतायत में पाए जाते थे।

काले पीले सर्प पहाड़ी डंकदार बिच्छुओं का भी भगवान के नाम में डर नहीं लगा, जब मन में धारणा हो जाती हैं कि मेरा शरीर तो भगवान को अर्पित है तो फिर डर किस बात का। लहलहराते झरने उफान भरी नदिंयों का भी मन में लेश मात्र डर नहीं था। तप करते करते अन्दर से कोई आवाज सुनने में आई की तुम यहां से सांचौर श्री श्री 1008 श्री शिवनाथजी महाराज के चरणों में चले जाओं वहा रहकर ही आप अपना कल्याण कर सकते हो, वो आवाज किसकी थी देखने में नहीं मिला मात्र सुनने को ही मिला। आपने अपने आश्रम कुकड़ी गुजरात वाली जगह पर धूणी के उपर सराय व चबुतरा बनाया। आप 1988 में सांचौर आये और गुरू महाराज श्री श्री 1008 श्री शिवनाथजी महाराज के चरणों में रहकर छह माह तक एकधारी सेवा की तब गुरू महाराज ने उपदेश देकर दीक्षा दी और गणेशनाथ नाम दिया।

दिनांक 18 मार्च 1994 को श्री श्री 1008 श्री शिवनाथजी महाराज ब्रह्मलीन हुए।
दिनांक 19 मई 1994 को आपके सानिध्य में भंडारा किया गया।
दिनांक 20 मई 1994 को बहुत बड़ी तादाद में संत, महंत, महात्माओं व हजारों भक्तजनों की उपस्थिती में आपका गादीतिलक किया गया।
आप तब से आज तक अनवरत समाज सुधार हेतु सदा अपना सर्वोच्च प्रदान करते हुए आज सांचौर क्षेत्र को शैक्षणिक, सामाजिक व भौतिक विकास में प्रदेश स्तर पर %

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